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        प्राचीन काल में तो बहुत सारे धर्म हुआ करते थे। प्राचीन अरब में यजीदी, मुशरिक, सबाईन और यहूदी धर्म प्रचलित थे लेकिन ईसाई और इस्लाम धर्म के उदय के बाद हजारों धर्म लुप्त हो गए। कट्टरपंथी देशों में बहुत से धर्मों का अस्तित्व मिट गया है और कुछ जो बचे हैं उनका अस्तित्व संकट में है। फिर भी एक अनुमानित आंकड़ों के अनुसार दुनियाभार में धर्मों की संख्या लगभग 300 से ज्यादा होगी, लेकिन व्यापक रूप से 7 धर्म ही प्रचलित हैं हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई, इस्लाम, यहूदी और वुडू। इसके अलावा पारसी, यजीदी, जेन, शिंतो, पेगन, बहाई, ड्रूज, मंदेंस, एलामितेस आदि धर्म को मानने वालों की संख्या बहुत कम हैं। 

यहूदी धर्म तो अब इसराइल में ही सिमट कर रह गया जबकि अन्य धर्म में से यजीदी का ही अब अस्तित्व बचा है। वह भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। ईरान में पारसी, ग्नोस्तिसिस्म, याज्दानिस्म अहल ई हक्क प्रचनल में था लेकिन वर्तमान में शिया और सूफी धर्म प्रचलन में हैं जो इस्लाम को मानने वाले हैं। पेगन धर्म की बात करें तो यह भी मध्य एशिया में जन्मा धर्म था। पेगन धर्म को मानने वालों के जर्मन के हिथ मूल का माना जाता है, लेकिन यह रोम, अरब और अन्य इलाकों में भी बहुतायत में थे। हालांकि इसका विस्तार यूरोप में ही ज्यादा था। एक मान्यता अनुसार यह अरब के मुशरिकों के धर्म की तरह था और इसका प्रचार-प्रसार अरब में भी काफी फैल चुका था। यह धर्म ईसाई धर्म के पूर्व अस्तित्व में था। ईसाईयत से पहले पेगन धर्म के लोगों की ही तादाद ज्यादा थी और वे अग्नि और सूर्य आदि प्राकृतिक तत्वों के मंदिर बनाकर उसमें उनकी मूर्तियां स्थापित करते थे। जहां विधिवत पूजा-पाठ वगैरह होता था। हालांकि वर्तमान में नव पेगनिज्म नाम से धर्म प्रचलन में है जिसके मानने वाले 10 लाख लोग हैं। 

इधर चीन, जापान कोरिया आदि जगहों पर जेन, शिंतो और लाओत्सु, ताओ, कन्फ्यूशीवाद धर्म के प्रभाव में यह सभी बौद्ध धर्म का हिस्सा बन गए। वियतनाम में बौद्ध के साथ ही काओ दाई धर्म भी प्रचलन में है। कोरियाई में बौद्ध के साथ ही चेनोडो मत और जुचे नामक विचारधारा भी प्रचलन में है। जापान में बौद्ध के साथ ही सोचो-नो-ले और तेनरिक्यो मत भी प्रचलन में है। जमैका, कैरिबियन, अफ्रीका में रस्ताफरी धार्मिक आंदोलन, जापान और ब्राजील में मेस्सिअनिटी चर्च, संयुक्त राज्य अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, यूरोप और कनाडा में विक्का नामक नया धार्मिक आंदोलन भी प्रचलन में है। यूरोप और अमेरिका में ऐसे कई चर्च है जिनकी कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट से बिल्कुल ही भिन्न विचार परंपरा है। इसके अलावा स्पिरिचवालिज्म़ जैसे कल्ट भी प्रचलन में है। यदि हम संपूर्ण दुनिया का भ्रमण करें तो पाएंगे कि उपरोक्त जितने भी धर्मों का उल्लेख किया गया है, उन सभी के अलावा ऐसे सैंकड़ों स्थानीय धर्म है, जिनका हमने कभी नाम भी नहीं सुना होगा, लेकिन वे प्रचलन में हैं। किन्तु सभी धर्मों में एक बात समान है, और वह है ‘‘प्रेम’’ तथा ‘‘कल्याण’’।

 ये सभी धर्म सहजयोग में समाहित हैं अर्थात् सहजयोग के अंश है। उपरोक्त कोई भी धर्म सम्पूर्ण नहीं है इसीलिए या तो वे टूट गए हैं या बिखर गए हैं या उनमें कट्टरता व हिंसकता पनप गई है। ये सभी धर्म बौद्धिक हैं। दिव्य शक्तियों का उनमें अभाव है। केवल नकारात्मक शक्तियां ही प्रभावशील है। नकारात्मक शक्ति व बाधाओं से कभी किसी का कल्याण नहीं हुआ है और न संभव है। प्रेम शब्द तो उनमें अश्लीलता और स्वार्थपरता का पर्याय बनकर रह गया है जबकि प्रेम से अधिक विशुद्ध कुछ नहीं हो सकता। इसीलिए इतने सारे धर्म होते हुए भी विश्व में असंतोष और अशांति बढ़ती जा रही है। लोग जितने अधिक धार्मिक दिखते हैं वे केवल उनका आडंबर मात्र है और सहजयोग के बगैर प्रेम और कल्याण की भावना जन-जन में स्थापित होने का विचार शेखी मात्र है।