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       हमें एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जो लोग हमारे साथ काम करते हैं, उन्हें हमारे भीतर के जीवन से कुछ लेना-देना नहीं है। उससे निपटना हमारा काम है। उनका अपना भीतर का जीवन है, जिसे उन्हें देखना है। उनके अपने नकारात्मक भाव हैं। उनकी अपनी निजी दिक्कतें हैं। लेकिन जब हम किसी के साथ काम कर रहे हों, तो हमें इसे बीच मंे नहीं लाना चाहिए, क्योंकि अगर हम उनकी सारी नकारात्मकता साथ लाने लगें, तो यह कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया हो जाएगी। फिर भी प्रायः हममें औरों की नकारात्मकताएं न चाहकर भी आ जाती है और हम अपने आप को विचलित महसूस करते हैं और यदि कभी विचलित महसूस न भी करें तो भी उनकी नकारात्मकताओं के दुष्परिणाम हमें दिनचर्या में, रोजमर्रा के जीवन में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक व सांसारिक रूप से भुगतने पड़ते हैं। तब हम परेशान हो जाते हैं और अपनी बुद्धि की सोच की सीमा के अनुसार इसे ही जीवन या भाग्य समझ लेते हैैं। 

इसके लिए हमारी सुक्ष्म गति भी जागृत होना चाहिए और वह सिर्फ सहजयोग द्वारा संभव है इसलिए सहजयोग अपनाकर आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करके प्रतिदिन रात को सोने से पहले फुटशोक करना चाहिए। फुटशोक से हमारी सभी नकारात्मकताएं पानी में बहकर निकल जाती है और उस पानी को हम फ्लश कर देते हैं तो वह भी नष्ट हो जाती है। इस प्रकार हम अपने जीवन में स्वस्थ स्वास्थ्य, शुद्धता व संतुलन बनाए रखने में कामयाब रहते हैं। जीवन तर्क नहीं है, जीवन प्रेम है। तर्क जटिल घटना हैं, प्रेम सरल है। प्रेम निर्दोष संवाद है। पे्रम जीवन के संगीत के अधिक करीब है। बजाए गणित के, क्यांेकि गणित मन का है और जीवन आपके हदय की धड़कनों में धड़कता है। वह सब जो आप कर रहे हैं, अगर उसमें प्रेम नहीं है, तो सब झूठा और बकवास है। लेकिन वह सब जो प्रेममय है, वह सब सत्य है। प्रेम की राह पर हम जो कुछ करते हो, हमारी वह आपकी चेतना को विकसित करता है। हमंे अधिक सत्य देता है और अधिक सच्चा बनाता है। 

हर चीज प्रेम के पीछे छिपी हुई होती है, क्योंकि प्रेम हर चीज की सुरक्षा कर सकता है। प्रेम इतना सुंदर है कि कुरूप चीज भी इसके भीतर छिप सकती है और सुंदर होने का ढोंग कर सकती है। श्रीमाताजी कहती है कि हृदय को इतना विशाल बना लीजिए, जितना की आकाश। संसार की जितनी भी गंदगी है, काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, अहंकार सब इसी में समाहित होगा। हृदय से प्रेम की गंगा बह निकले। हम जहां भी जाए, हमसे सभी प्यार करें। हमें सभी लोग चाहे। हमारे मुख से सहज की मर्यादा से भरे हुए एक-एक शब्द निकलें, उन शब्दों को सुनकर सभी लोग खुश हो जाए और हमें प्यार करें तथा सहज को अपनाए।