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        मेरे बच्चे होना भी आसान काम नहीं है क्योंकि जो भी आप करते हैं, मैं सब जानती हूं अतः आपके बारे में मैं हर बात जानती हूं। आप ये भी जानते हैं कि मैं आपको सुधारती भी हूं परंतु जब आप मुझसे जुड़े रहते हैं तो यह दर्शाता है कि आप लोगों की उस श्रैणी में से हैं जो विकसित होने के लिए आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से बेहतर बनने के लिए दृढ़ संकल्पित है। श्रीमाताजी के इस संदेश के परिप्रेक्ष्य में समष्टि में वर्तमान में झांकें तो यह भी प्रकट होता है कि कुसंस्कार और ओछी विचारधारा के कारण मनुष्य का जीवन कष्टमय बना हुआ है तथा उसका स्त्रोत उसके जन्मदाता व परिवार की पृष्ठभूमि है। 

बच्चे वैसा ही बनते हैं जैसा ही वे अपने माता-पिता को देखते हैं अर्थात् माता-पिता के जो गुण-अवगुण होते हैं उनमें से कुछ तो जन्म के साथ ही आते हैं और रोजमर्रा के जीवन से भी सिखते हैं। माता-पिता यदि झुठ बोलते हैं तो बच्चे भी झुठ बोलना सिखते हैं, माता-पिता अपराधी हैं या आपराधिक विचारधारा रखते हैं तो बच्चें भी उसी प्रकार अपराध की ओर अग्रसर होते हैं। यहां तक कि बच्चों की जीवनशैली व विचारधारा उसी प्रकार संस्कारित होती है जैसी वे अपने माता-पिता से पाते हैं या उनमें देखते हैं। बच्चें पहले तो अबोध होते हैं और इस अबोधिता मंे ही जो उन्हें दृढ़तापूर्वक निरंतर मिलता है उसी में वे विकसित होते हैं। 

आज लोगों मंे जाति, धर्म, व्यवसाय और कई सारी चीजों के प्रति पूर्वाग्रह है। यह आवश्यक है कि बच्चों को खुलापन मिलना चाहिए ताकि वे अपनी दृष्टि विशाल रख सकें और जड़े मजबूत। जिन बच्चों को नैतिक और धार्मिक मूल्य नहीं सिखाए जाते, वे बडे होकर जड से उखडे वृक्ष जैसे हो जाते हैं। इसीलिए माता-पिता को सुनिश्चित करना है कि जब बालपन की शाखाएं फैलने लगें, तब उनकी जडें मजबूत बनें। बच्चांे में आध्यात्मिकता गहरी बैठना चाहिए और उन्हें सुसंस्कृत होना चाहिए जिससे राष्ट्रवाद स्थापित हो सकें और आतंक के मार्ग नष्ट हो सकें। इसके लिए सबसे अधिक सरल रास्ता सहजयोग है। यदि व्यक्ति चुनौती न दें और होने दें और होने को स्वीकार करें तो  सहजयोग ध्यान के द्वारा कुण्डलिनी स्वतः ही व्यक्ति मंे परिवर्तन ला देती है।