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‘परमात्मा की इच्छा‘ महत्वपूर्ण है तो इसे प्रमाणित भी किया जाना चाहिए और अब सहजयोग के माध्यम से सहस्त्रार भेदन के पश्चात् आपने पहली बार ‘परमात्मा की इच्छा‘ को महसूस किया है कि यह इतनी महत्वपूर्ण है। सहजयोग अपनाने के बाद व्यक्ति उस विशाल कम्प्यूटर के, उस ‘परमात्मा की इच्छा‘ के अंग प्रत्यंग बन जाते हैं। ‘परमात्मा की इच्छा‘ के माध्यम या उसके उपकरण बन जाते हैं। क्योंकि  परमात्मा की जिस इच्छा ने पूरे ब्रम्हाण्ड की सृष्टि की है वे उससे जुड़ जाते हैं। अतः वे सभी कुछ चला सकते हैं क्योंकि अब ‘पूर्ण विज्ञान उन्हें प्राप्त हो जाता है;  ‘पूर्ण विज्ञान‘ जो समूचे विश्व का हित करेगा।

 वैज्ञानिकों के सम्मुख भी हम यह साबित कर सकते हैं कि ‘परमात्मा की इच्छा‘ है जिसने सारा सृजन किया है। यहां तक की विकास प्रणाली भी ‘परमात्मा की इच्छा‘ ही है। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी घटित न हो पाता। इसी कारण बहुत से लोग कहा करते थो कि ‘परमात्मा की इच्छा‘ के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, यह सत्य है। और अब आपने देखा है कि वही ‘परमात्मा की इच्छा‘ हमने अपनी शक्ति के रूप में प्राप्त कर ली है। हम इसका उपयोग कर सकते हैं। इसी इच्छा ने इस पूरे विश्व, ब्रम्हाण्ड, पृथ्वी माँ तथा अन्य सभी चीजों की सृष्टि की है। अतः अब हम एक नए आयाम का सामना कर रहे हैं और यह आयाम यह है कि हम ‘परमात्मा की इच्छा‘ के माध्यम हैं। तो हमारे कर्तव्य क्या हैं और इसके विषय में हमेें क्या करना चाहिए? सहस्त्रार खुलने के पश्चात् एक चीज़ जो घटित हुई वह थी हमारी भ्रान्ति का समाप्त हो जाना। सर्व शक्तिमान परमात्मा, उनकी इच्छा की शक्ति और सहजयोग के सत्य के विषय में आपमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। इस मामले पर हमें कोई सन्देह नहीं होना चाहिए।

अभी तक भी जब लोग अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने घर, अपनी नौकरियों के विषय में चिन्तित रहते हैं तो उनका स्तर क्या है। वे कहां है ? अपनी भूमिका को वे कहां तक निभा पाएंगे! फैशन ने लोगों की बुद्धि कितनी भ्रष्ट की है! वे कोई विवेकमय चीज़ अपना ही नहीं सकते। छोटे स्कर्ट का फैशन है तो आपको लम्बा स्कर्ट मिलेगा ही नहीं। इस प्रकार चीजें प्रातः से शाम तक हमारे मस्तिष्क में भरी जाती है। परिणाम स्वरूप हम उद्यमियों के दास बन जाते हैं। कई देशों में तो कोई भी ताजा चीज़ उपलब्ध नहीं है। शनैः शनैः हम अस्वाभाविक होते चले जा रहे हैं। विज्ञापन एवं ब्राहृा प्रभावों में खोकर, आधुनिक पदार्थों से प्रभावित हो हम अपने अन्तर्जात विवेक को भूल जाते हैं।

यदि आप अपनी गलतियों को देख सकते हैं, यदि आप अपने दोष खोज सकते हैं और उन दोषों से स्वयं को हटा सकते हैं, यदि आप यह बात समझ सकते हैं कि ये लिपसाएं, दोष और आदतें पतन की ओर घसीट रही हैं तभी आप उन्हें त्याग सकते हैं। परन्तु ऐसा केवल तभी घटित हो सकता हैं, जब आत्मारूपी दर्पण आपके अन्दर चमक रहा हो, ये प्रकाश जब आपमें आ जाता हैं तो आप स्वयं देखते हैं कि हममें क्या कमी हैं और कौनसा गलत मार्ग अपना रहे हैं।

 परन्तु सहजयोग ने विज्ञान के उस महान सत्य को प्रकट किया है जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती। यदि परमात्मा को बदनाम करते हुए या परमात्मा के अस्तित्व को नकारने का प्रयत्न कोई व्यक्ति करे तो हम न केवल परमात्मा के अस्तित्व को प्रमाणित कर सकते हैं, हम यह भी साबित कर सकते हैं कि सभी कुछ ‘परमात्मा की इच्छा‘ से अत्यन्त संगीतमय ढंग से हुआ। परमात्मा द्वारा सृजित की गई चीजों के लिए मानव को श्रेय नहीं लेना चाहिए। इस शक्ति का उपयोग करते हुए आपको पता होना चाहिए कि यह आपको इसलिए प्रदान की गई क्योंकि इसे संभालने की योग्यता आपमें है। अपनकी वृद्धि जहां तक सोच सकती है उन शक्तियों में यह महानतम है।