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श्री आदिशंकराचार्य कहते है किः-

1. यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तारित हो, मेरू पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरू के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ? 

2. सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो किंतु गुरू के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इस प्रारब्ध सुख्.ा से क्या लाभ ? 

3. वेद एवं षड्वेदाडगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उनका मन यदि गुरू के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ ?

4. जिन्हें विदेशों में समादर मिलता हो, अपने देष में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उनका भी मन गुरू के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो सद्गुणों से क्या लाभ ?

5. जिन महानुभाव के चरणकमल पृथ्वीमण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित रहा करते हों, किंतु उनका मन यदि गुरू के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इस सभ्दाग्य से क्या लाभ ?

6. दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिग्दिगंतरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरू की सहज कृपादृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-ऐश्वर्य हस्तगत हों, किंतु उनका मन यदि गुरू के श्रीचरणों में आसक्तभाव न रखता हो तो इन सारे ऐश्वर्यों से क्या लाभ ?

7. जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, स्त्री-सुख और धनोभोग से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरू के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो मन की इस अटलता से क्या लाभ ?

8. जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भण्डार में आसक्त न हो, पर गुरू के श्रीचरणों में भी वह मन आसक्त न हो पाये तो इन सारी अनासक्तियों का ढंरथिःक्या लाभ ?

9. जो यति, राजा, ब्रम्हाचारी एवं ग्रहस्थ इस गुरू अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरू के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवं ब्रम्हापद इन दोनों को समाप्त कर लेता है यह निश्चित है। 

 

सद्गुरू वही है जो साहेब से मिला है। यही समझाने के लिए इस पृथ्वी पर अनेक सद्गुरूओं ने जन्म लिए है। एक सादा सा नुस्का है कि मनुष्य को अपना जीवन समतोल रखना चाहिए। वह व्यवहारिक हो, या वैवाहिक हो, या सामाजिक जीवन हो सभी में संतुलन होना  चाहिए। जो मनुष्य बहुत ज्यादा स्पर्धा में रहता है वह अंत में पागल हो जाता है। मनुष्य ने संतुलित जीवन जीकर अपने शरीर के सद्गुरू तत्व के सद्गुरू तत्व को मजबूत करना चाहिए तभी मनुष्य अपने धर्म को पहचानने में समर्थ होता है। 

 

सद्गुरू तत्व प्रमुखतः हमारे शरीर में यकृत में स्थित होता है। सद्गुरू तत्व से चेतना शक्ति कार्यान्वित होती है। जब यकृत खराब होता है, तो चेतना विचलित होती है। जिस मनुष्य की पित्त पृवृत्ति होती है। उसने तली हुई चीजें खायीं तो उसे पित्त की तकलिफ होती है। यकृत हमारे शरीर में से शरीर के लिए पोषक न होने वाले पदार्थों का विश्लेषण करके उन्हें अलग करता है। इसीलिए नशा मानव धर्म की विरोध में है। 

 

अब सवाल उठता हैं, सद्गुरू तत्व की रक्षा कैसे करें। तो सर्वप्रथम आपको ंयह समझना होगा कि आपके गुरू कौन है। जो आत्मसाक्षात्कारी नहीं हैं, वे सद्गुरू नहीं हो सकते। मां के पास जो करूणा होती है। वह उन लोगों में नहीं होगी। विश्व में अब तक जितने सद्गुरू हुए है उन्होंनें सहज योग का ही मार्ग अपनाया है जैसे- श्री ज्ञानेश्वर, श्री तुकाराम, श्री नामदेव, श्री नानक, श्री कबीर, श्री आदिनाथ, श्री लाओत्से, श्री कंफुसियस, श्री शिर्डी के सांई आदि। 

 

आज इस घोर कलियुग को कृतयुग से होते हुए  सत्युग में परिवर्तित करने वाली मातृरूपी गुरू का अवतरण प.पू. माताजी श्री निर्मला देवी सद्गुरू के रूप में जन-जन को आत्मसाक्षात्कार देकर उनके स्वयं के गुरूतत्व को जागृत कर रही हैं। जिससे आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति सहजयोगी स्वयं का गुरू यानि स्वयं को मार्गदर्शित करने वाले के रूप में विकसित हो रहा है। 

 

स्वयं माताजी श्री निर्मला देवी के अनुसारः-

 सर्वप्रथम आपको जानना है कि आपकी गुरू कौन है ? साक्षात् श्री आदिशक्ति परमात्मा हैं। यह बहुत बडी बात है। ( 29 जुलाई 1981) आदिशक्ति किसी को गुरू रूप में प्राप्त नही हुई। आदिशक्ति परमात्मा की सभी शक्तियां है। वे गुरूरूप में साक्षात् आपकी मां बैठी हैं। (4 जुलाई 1993)