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गुरू के प्रति एक दम से समर्पित होने से पूर्व साधक उसके कुछ पहलुओं को जान सकता है। सर्वप्रथम इस बात की जॉंच पड़ताल होनी चाहिए कि गुरू जो शिक्षा देता है वह उस पर चलता भी है कि नहीं। दोरंगेपन का दोष गुरू में नहीं होना चाहिए। वह यदि त्याग की शिक्षा देता है तो उसका स्विस बैंक में खाता नहीं होना चाहिए। व्यक्ति को प्रश्न करना चाहिए, ’’क्या चीज मुझे उस पुरूष या महिला की तरफ आकर्षित करती है। क्या ये उसकी योगसिद्धि, यौनाकर्षण या अनुयायियों की भीड़ है। क्या वो माता-पिता सम लगता है या पति-पत्नि का विकल्प। कहीं किसी समूह से जुड़े रहने की मेरी इच्छा असुरक्षा की भावना के कारण तो नहीं। क्या यह मेरा पलायन या सनक है। मेरी क्या दिलचस्पी है। उद्देश्य यदि दूषित होगा तो शुद्ध इच्छा के अभाव के कारण व्यक्ति आत्म छल के जाल में फॅंस जाएगा। गुरूओं की अविद्याओं के कारण ही पाश्चातय देशों में भी आध्यात्मिक शान्ति और आध्यात्मिक ज्ञान के नाम पर भ्रमित हो रहे है। अब तो हमारे यहां भी सही व गलत पूर्व की पहचान करना हर एक के वश में नहीं रहा है।

चिकने पन्नों वाली पत्रिकाओं में पूर्ण पृष्ठ का विज्ञापन,दूरदर्शन विज्ञापन और लाभकारी सौदे करने के लिए दर-दर विक्रेयता रखे गए है। कुछ उद्यमी अपनी बिक्री को बढ़ाने के लिए हालीवुड के फिल्मी सितारों की तरह से वस्त्र पहनते है और प्रदर्शन के लिए व स्वयं को सजाते है। अमीर लोगों को सर्वोत्तम तथा चोटी की वस्तुएं उपलब्ध करवाने के लिए आकर्षण मूल्य पट्टियॉं लगाई जाती हैं और ये वस्तुएं ही सबसे अधिक बिकती हैं। अधिकतर लोगों के लिए यह वैकल्पित समय व्यतीत करने का साधन या जीवन शैली हैं। परन्तु इस विकल्प में किसी भी प्रकार आत्मज्ञान की खोज निहित नहीं है। इस विषय का संबंध अमरीका के ग्राहक के सम्मुख प्रस्तुत किए जाने वाले हजारों विकल्पों या चयनों से है,स्थिरता, वास्तविकता या सत्य के प्रति यह वचनबद्ध नहीं है। वास्तव में यह सब अल्पायु है। हर मौसम में फैशन परिवर्तित हो जाता है। उद्यमियों की कार्य प्रणाली भी बदल जाती है। प्रायः वे किसी स्वामी की तरह से छद्म वेश पहनना चाहते है या किसी भारतीय गुरू की तरह से गेरूए वस्त्र। ग्राहक को फॅसाने के लिए बहुत सी विधियॉं खोजी जाती है। अधिक संवेदक अन्तर्दृष्टि,हवा में उड़ना,परमात्मा से सम्पर्क,सम्मोहन एवं अहम् को बढ़ावा देने के वचन दन शिकंजों में से कुछ हैं आज का साहसी समाज नवीनता का आनन्द लेता है।

सभी सम्मोहक शक्तियॉं जैसे कार्यान्वयन शक्ति /जनता को धन , सत्ता या यश के लिए गुलाम बनाना/, दिव्य दर्शन शक्ति,वाक् शक्ति, रोग मुक्त करने की शक्ति, अनुभवातीत भाव/मस्तिष्क को शून्य कर देने की शक्ति/ नक्षत्रीय यात्रा में जैसे किया जाता है, शरीर को पृथक कर लेना तथा और भी बहुत सी शक्तियॉ प्रायः मृत आत्माओं को वश में करने का अभ्यास करने वाल लोगों में पाई जाती है। भारत के किसी भी सहजयोग ध्यान केन्द्र में दर्शाया जा सकता है कि ये शक्तियॉं मृत आत्माओं से आती है। अधिकतर मनोवैज्ञनिक, अवचेतन और पराचेतन समूह नशीले पदार्थो की तरह से है। वे साधकों को फॅंसा कर शिकंजे में ले लेते है। ये लोग अत्यन्त कपटी हैं और इनके जाल का जब पता चलता है तब तक बहुत देर हसे चुकी होती है।

श्री आदिषक्ति माताजी प.पू. श्री निर्मला देवी के अनुसार :-

’’ गुरू के प्रति व्यक्ति के समर्पण की शक्ति श्री हनुमान जी की है। किस प्रकार से आप गुरू को प्रसन्न कर सकते हैं और उसका सामीप्य प्राप्त कर सकते है। सामीप्य का अर्थ शारीरिक सामीप्य नहीं। इसका अर्थ है एक प्रकार का तदात्म्य, एक प्रकार की समझ। मुझसे दूर रहकर भी सहजयोगी अपने हृदय में मेरा अनुभव कर सकते हैं। यह शक्ति हमें श्री हनुमान जी से प्राप्त करनी है। उनका एक अन्य गुण यह भी है कि दो अहंकारी व्यक्तियों को मिलाकर वे उनसे ऐसे हालात पैदा करवा देते हैं कि दोनो नम्र होकर मित्र बन जाते हैं।’