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       होली मात्र एक सामुदायिक त्योहार नहीं, बल्कि एक दुर्लभ अवसर है। एक ऐसा दुर्लभ अवसर, जिसकी विवेचना और सही पालना, दोनों ही कार्य अधूरे लगने लगे हैं। कहीं न कहीं यह एहसास बनने लगा है कि हम असली होली भूलते जा रहे  हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि अच्छी होली को समझने-समझाने का चलने कमजोर पड़ता जा रहा है। ऐसा नहीं कि मात्र पानी की कमी के कारण होली प्रभावित हुई हो, दरअसल कमी उस भाव में आ रही है, जो हमें होली मनाने के लिए प्रेरित करता है। वस्तुत- मन ही वह सच्चा संसाधन है, जो होली को सार्थक करता है। आज हम इतनी ज्यादा इच्छाओं से घिरे रहते हैं कि होली मनाने की इच्छा हाशिए पर चली जाती है। 

यहां हम उन भक्त प्रहलाद को याद करें, तो अप्रासंगिक नहीं होगा। वही प्रहलाद, जो होलिका की अग्नि से बच निकले थे। बाद में उनकी रक्षा के लिए प्रकट हुए भगवान ने प्रहलाद से वर मांगने के लिए कहा, तो अव्वल तो प्रहलाद ने साफ कर दिया कि मैंने वणिक भक्ति नहीं की है, कुछ पाने के लिए भक्ति नहीं की है। लेकिन जब भगवान ने बार-बार प्रहलाद से कहा कि कुछ मांगों, तो प्रहलाद ने मांगा- वर दीजिए, मेरी सारी इच्छाएं ही नष्ट हो जाएं। निस्संदेह, होली की बुनियाद भक्त प्रहलाद ही हैं, जो हर स्वार्थ, हर इच्छा से बचना चाहते हैं, पर पुराण गवाह है कि भगवान ने प्रहलाद को राज बनाकर प्रजा की इच्छाओं की पूर्ति के लिए सब कुछ दे दिया। आज होली के भाव को समझने के लिए हमें प्रहलाद के भाव को समझना चाहिए। 

होली के भाव को जो चोट लग रही है, उसका मुख्य कारण है, आज हर तरह के संबंध वाणिज्य आधारित होते जा रहे हैं। सच्ची होली में लेन-देन का भाव कतई नहीं है और दूसरों को सच्चा रंग वही लगा सकता है, जो दूसरे की इच्छाओें का आदर करता हो। दूसरे की इच्छाओं का आदर करने का अर्थ है, दूसरों को अपना बना लेना। हमें याद रखना चाहिए कि प्रहलाद के ऐसे भाव-सद्भाव पर ही होली खड़ी होती है, भारत खड़ा होता है। पुराण गवाह हैं, प्रहलाद अपने समय में भारत और भारतीयता की नींव रखने वाले प्रतापी राजा थे। उसी नींव का एक मूल्य महोत्सव होली है। 

आज यदि होली मात्र शुभकामना संदेशों और होली-मिलन की औपचारिकता तक सिमटती जा रही है, तो समाज पर उसके दुष्परिणाम भी बहुत स्पष्ट हैं। बदलती हुई होली हमें बदलते हुए समाज का चेहरा दिखा रही है। क्या आज हर स्तर पर परस्पर मेल-जोल मंे कमी नहीं आई है ? परस्पर समाजों और समुदायों में दूसरों की इच्छाओं के अनादर का रोग नहीं पनप रहा है ? उत्सव के क्षण हमसे धीरे-धीरे छिनते जा रहे हैं और उसकी जगह चिंता या चिंतन की मजबूरी हावी हो रही है। हमेें गौर करना चाहिए, होली पर परस्पर अविश्वास, रोष की ऐसा छाया कब थी और ऊपर से कोरोना वायरस जैसी महामारी का हमला तो कल्पना से परे था ? इन तमाम स्याह सायों के बावजूद होली अपने मूल संदेश के साथ फिर आ गई है। हमसे गुहार लगा रही है कि मेल-जोल का, सद्भाव का कोई विकल्प नहीं है। महोत्सव मनाना है, तो वैर-विद्वेष भुलाना ही होगा, सिर्फ स्वार्थ से पैदा दूनियों को मिटाना होगा, सबको गले लगाना होगा। भारत की होली से दुनिया सीखती रही है, तो मनाइए ऐसी अच्छी होली कि दुनिया देखे और भारत को समझे।