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पांच साल की बच्ची थी-डी मैगनेटिक टाइल्स से अपना घर बनाने में जुटी है। हो सकता है कि उसे यह घर बनाने में दस दिन लगें। उसकी मां यह खिलौना अमेरिका से लाई थी। इस खिलौने में दो सौ हिस्से हैं, जिन्हें जोड़कर बच्चे को घर बनाना है। उसकी मां का कहना है कि भारत में ऐसे खिलौने बहुत कम मिलते हैं, जो बच्चे की कल्पना शीलता को बढ़ाते हों। यही नहीं, खिलौनों की दुकानें भी बहुत कम हैं। फिर यहां बच्चे के लिए बहुत से विकल्प भी नहीं हैं। या तो बाबीं मिलती है या टीवी और इंटरनेट पर दिखाए जाते कार्टून कैरेक्टर। पर सच यह है कि दुनिया भर में खिलौनों का हाल वही है, जो भारत में है। पिछले साल फ्रांस के कई माॅल की खिलौनों की दुकानों को देखने का अवसर मिला था। वहां भी तरह-तरह की बारबी और स्पाइडर मैन, बैटमैन सुपरमैन आदि खिलौने ही छाए हुए थे। या तरह-तरह की बंदूकें थीं। आज भारत के बाजार चीन में बने खिलौनों से भी भरे हुए हैं, जिनके बार में आम धारणा यही है कि उनकी गुणवत्ता हर तरह से बहुत खराब है। एक दूसरा सच यह भी है कि समय के साथ खिलौनों की बहुत सी दुकानें भी गायब होती गई हैं। जहां हैं भी, तो वे बहुत छोटी हैं और उनमें खिलौने बहुत महंगे हैं। जिन घर बनाने वाली टाइल्स का जिक्र ऊपर किया है, उसकी कीमत तीन हजार से पांच हजार रूपये है। कुछ खिलौने 14 हजार रूपये तक के हैं। मामूली गुड़िया तक सात-आठ सौ रूपये की आती है। इतने महंगे खिलौने भारत की बहुसंख्यक आबादी नहीं खरीद सकती। लेकिन इस सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम नहीं जानते कि हमारे बच्चे जिन खिलौनों से खेल रहे हैं, वे कितने सुरक्षित हैं। हमारे देश में कभी कपड़े के बने खिलौने जैसे गुड़िया, शेर, चीते, भालू, हाथी, बत्तख, गुजरिया, मोर, खरगोश आदि बनाए जाते थे। इन्हें बनाने में हमारे घर की महिलाओं की कलाकारी, लड़कियों को दिया जाने वाला पारिवारिक ज्ञान, अपने पर्यावरण, पशु-पक्षियों से नजदिकी और पुराने कपड़ों की रिसाइक्लिंग आदि को सिखाने के लिए घर प्राथमिक पाठशाला होता था। सूती कपड़े से बने खिलौनों से बच्चों को किसी प्रकार समस्या की आशंका भी नहीं होती थी। बाजार में भी जो ऐसे खिलौने मिलते थे, वे गृह उद्योगों में ही बनते थे। इसके अलावा मिट्टी, लकड़ी, भूसे, नारियल तथा तमाम स्थानीय चीजों से भी खिलौने बनते थे। उत्तर भारत की गुड़िया के नाक-नक्श और पहनावा दक्षिण भारतीय गुड़िया से अलग होता था। खिलौने बरतन भी तरह-तरह के होते थे। मिट्टी, जूट लकड़ी, पीतल, कांसे, लोहे से बने। इसी तरह पेड़, पौधे और वनस्पतियां भी बनाई जाती थीं। ये सब खिलौने न केवल बच्चों की कल्पना शक्ति को बढ़ाते थे, बल्कि अपने आसपास से सचेत करते थे। साथ ही इन तक हर बच्चे की पहुंच भी थी। लेकिन बड़े उद्योगों मंे प्लास्टिक और रसायनों से तैयार आकर्षक खिलौनों ने इस समीकरण को बदल दिया है। यही नहीं, इन खिलौनों में विविधता भी होती थी।