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एक दिन हमें पता चलता है कि लैटिन अमेरिका में ऐसा पेड़ पाया जाता है, जिसके फूल हूबहू खूबसुरत औरत की तरह होते हैं। जब हम इसकी तस्वीर देखते हैं, तो दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। फिर दो दिन बाद पता लगता है कि यह सिर्फ फोटोशाॅप पर की गई कलाकारी थी, वास्तव में ऐसा कोई पेड़ या पौधा नहीं होता। यहां जान-बूझकर ऐसा उदाहरण दिया गया है, जो बहुत साधारण है और किसी को आहत करने वाला नहीं है। 

इंटरनेट को जानकारियों का खजाना माना जाता है, लेकिन यह कई बार झूठ और फरेब के भी उतने ही बड़े कारखाने की तरह दिखता है, जिसमें लोगों को भ्रमित करने, बदनाम करने और किसी खास तरह की राजनीति के पक्ष में गोलबंद करने का काम बड़े पैमाने पर होता है। इंटरनेट में खासकर सोशल मीडिया ने झूठ को दिखाने और सुनाने की ऐसी शैली विकसित की है कि अक्सर लोग उस पर सहज ही विश्वास कर लेते हैं, धोखे का एहसास उन्हें बहुत बाद में होता है। शायद ही ऐसा कोई हो, जिसने इंटरनेट पर इतना बड़ा धोखा न खाया हो। कोई भी इससे नहीं बच पाता। और किसी को नहीं पता कि इससे बचा भी जाए तो कैसे ? कई वेबसाइट, कई अखबार इसके खंडन के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं, कुछ तो बकायदा अभियान भी चला रहे हैं, लेकिन समस्या खत्म होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है। 

अमेरिका के प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक नील डिग्रासे टायसन का कहना है कि यह समस्या इसलिए भी बड़ी है कि इंटरनेट पर सूचनाओं का बहुत बड़ा ढेर है औश्र इन सूचनाओं को इस्तेमाल किस तरह से करना है या उन्हें किस तरह से ग्रहण करना है, इसे लेकर हम बिल्कुल भी प्रशिक्षित नहीं होते। दूसरे शब्दों में कहें, तो सूचनाओं के मामले में हम अशिक्षित ही हैं। उनका कहना है कि हमारे स्कूल, काॅलेज सब हमें एक निश्चित सिलेबस, एक निश्चित कोर्स पढ़ाते हैं, लेकिन यह कहीं किसी को नहीं पढ़ाया जाता कि सच और झूठ मंे फर्क कैसे करना है। अगर कोई सूचना सामने है, तो वह गलत है या सही, भरोसेमंद है या नहीं, यह भेद करना किसी को नहीं सिखाया जाता। वह मानते हैं कि यह निरक्षरता ही समस्या की असली जड़ है। टायसन के अनुसार लोगों में वैज्ञानिक चेतना विकसित करके ही इस समस्या को खत्म किया जा सकता है। लोगों को बस यह सिखाना होगा कि चीजें कैसे काम करती हैं और लोग अपने आप झूठ पकड़ना सीख लेंगे। 

आमतौर पर वैज्ञानिक चेतना की बात भौतिकवादी विचारधाराओं के लोग और नास्तिक वगैरह ही ज्यादा करते हैं, वैज्ञानिक इस चर्चा में कम ही शामिल होते हैं। नील टायसन शीर्ष वैज्ञानिक हैं और हम उन्हें अकसर अंतरिक्ष विज्ञान की कई डाॅक्यूमेंटरी वगैरह में देखते हैं। उन्हंे एक अच्छा कम्युनिकेटर भी माना जाता है और इंटरनेट की निरक्षरता पर हाल में ही उन्होंने भाषण दिया है, वह वीडियो भी देखने लायक है, जिसके तर्क काफी प्रभावित करते हैं। वैसे दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री इस पहेली का हल सुलझाने के लिए जूझ रहे हैं कि इंटरनेट पर इतना झूठ कहां से आया और इससे निपटने या इससे मुक्ति का क्या तरीका है ? टायसन ने इसका हल तो सुझाया है ही, साथ ही इस बात की ओर भी ध्यान खींचा है कि इंटरनेट युग की जरूरतों के हिसाब में शिक्षा में सुधार का वक्त आ गया है।